अलमारी में कैद बचपन!

This post is restricted to Hindi readers only. I tried translating it in English but it was losing it’s essence.

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महीनों बाद घर वापिस जाना हुआ।
अनजान सड़कों से गुज़रकर, फिर पुरानी गलियों पर आना हुआ।

माँ ने पुरानी अलमारी को साफ़ करने को कहा।
बेकार चीज़ों को फेंक, कीमती को जमाने को कहा।

वो जंग लगा दरवाज़ा कुछ इस तरह खुला।
सिर्फ सामान नही, मानों पूरा बचपन सामने आ गिरा।

वो रंग- बिरंगी कलमें और उनसे भरी किताबें,
जिसमें न जाने कितने सपनें थे छापें।

उनपर धूल का कुछ इस तरह था साया,
मानों बचपन पर झूठे बड़प्पन का अंधकार हैं छाया।

उन पन्नों को पलटते हुए, न जाने कब आंखें कुछ नम सी हुई।
उन रंगों से भरी पुरानी दोपहरों में, मैं कुछ गुम सी हुई।

घंटों बिताने के बाद भी, कुछ सामान फेंक न पायी।
लाख कोशिशों के बाद भी, वो पहाड़ी और आधा सूरज बना न पायी।

बंद करके वो अलमारी, वापिस मुड़कर देख न पायी।
चीख रहा था बचपन उसमें मेरा,
सुनकर भी वो चींख, मैं सुन न पायी।

Shreya Agrawal

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5 thoughts on “अलमारी में कैद बचपन!

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